Saturday, 10 March 2012

तुम मुझे भूले नहीं ये जानकार अच्छा लगा


तुम मुझे भूले नहीं ये जानकार अच्छा लगा;
जैसे किताबों में फूल, सूखे ही सही काफ़ी तो हैं.

मिल न सके हम,यादों का आना अच्छा लगा;
डूबे न किनारे, लहरों का छू जाना काफ़ी तो है.

दौड़ कर तुमसे लिपट जाऊँ ख़याल अच्छा लगा;
मुझको छूकर तुम तक गई,ये हवा काफ़ी तो है.

मैं एक क़तरा जिंदगी, तुम समंदर अच्छा लगा;
तुम नहीं न सही, अश्को का समंदर काफ़ी तो है.

Thursday, 8 March 2012

होली


आए बसंत भर जाये फूलों से झोली;
ऐसे मे खेले ये मन प्रकृति भी होली.

आसमान में बादल की रंग बिरंगी टोली;
जो इठला- इठला के करें हँसी ठिठोली.

पिया रंग में रंगी जो चुनर ये ओढ़ ली;
अब तो बस खेलूँ मैं पिया रंग की होली.

पिया को कैसे कह दे, मधुर हो होली;
जब तक मन से मैं न पिया की हो ली.

Saturday, 3 March 2012

सत्य है,तुम्हारा अकेलापन



तुम भीड़ में भी कितने अकेले हो,
ठहर कर देखो.
तुम भाग नहीं सकते,
ख़ुद से और इस भीड़ से.
पर तुम बिलकुल अकेले हो,
और तुम्हे जीना होगा इस सच्चाई को.
उस पल में सुनते हो लोगों को, 
या नहीं सुनते,
पर तुम्हारे भीतर है एक आवाज.
आवाज जो बार बार कहती है, 
कि तुम  अकेले हो.
ऐसा होता है,
जब तुम भीड़ में होते हो.
पर क्या भीड़ तुम्हे जान पाती है.
नहीं, नहीं जान पाती.
तो फिर तुम भीड़ में अकेले हुए.
सत्य यही है,
तुम अकेले आये थे, अकेले जाओगे. 
बाकी सब भ्रम है.
सत्य है, तुम्हारा अकेलापन.

Thursday, 16 February 2012

गर्दिश-ए-शाम बन गया हूँ मैं


गर्दिश-ए-शाम बन गया हूँ मैं; 
तेरे पहलू से जो उठ गया हूँ मैं.

आईना देखता हूँ, मैं तुझको पाता हूँ;
कि नज़र हो तेरी, और बयाँ हूँ मैं.

अपना साया भी तो अपना न रहा;
बिछुड़ के तुझसे यूँ तन्हा हूँ मैं.

ज़ख्म तेरा हो या मेरा हो;
अपने इस दिल मे जी रहा हूँ मैं.

है 'मुसाफिर', है मोहब्बत का सफ़र;
आश है तेरी तो चल रहा हूँ मैं.

Thursday, 2 February 2012

काश मैं बदल सकता वक़्त


गुज़रते हुए देखें हैं, साल कई;
गुज़रते हुए देखें हैं, लोग कई.

पर दर्द असहनीय और गहरा देखा;
जब बेटे को पिता के कंधों पर जाता देखा.

काल से पूछता हूँ, क्या वो भी है किसी का बाप;
या सिर्फ़ बना है, ऐसों के लिए अभिशाप.

सुना है आत्मा अजर है, अमर है;
किंतु नही समझना चाहता इसे.

सिर्फ़ समझना चाहता हूँ वो दुख;
जब देखता हूँ, अश्रु पूरित नेत्र.

नही है कोई अधिकार;
नही बदल सकता मैं वक़्त.

पर काश मैं बदल सकता ..............

Friday, 30 December 2011

जिंदगी का राज


मुझे ये जिंदगी का राज समझ आया करीने से,
कि खुश्बू फूल की आती है मेहनत करके जीने से।

तुम्हे कतरा कह कर लोग ठुकराए तो भी क्या,
समंदर बनके निकले मोहब्बत,बूँद के ही सीने से.

रोटी बनती नही है रुपये दौलत या नगीने से.
आगर न सीँचे मिट्टी आदम का घीसू पसीने से।

घुटन सी एक मैं महसूस करता हूँ शहरों मे,
यहाँ अब दिन गुज़रते है बरसों या महीने से.

चलो रुख़ कर लो 'मुसाफिर' गावों की तरफ फिर से,
मिला है क्या तुम्हे इस शहर मे घुट घुट के जीने से.

Friday, 28 October 2011

जिंदगी क्या है


जिंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो;
मोहब्बत क्या है किसी को अपना बनाकर देखो.

सफ़र जिंदगी का है नये रास्तों से ही;
जिंदगी क्या है,नये रास्ते बनाकर देखो.

समंदर के सीने मे मौज है कितनी;
समंदर के सीने मे तुम समाकर देखो.

तुम समझ न सकोगे दूरियो की तड़प को;
अंधेरा होता है क्या, रोशनी को हटा कर देखो.

आग होती है क्या, हर तरफ धुआँ सा लगता है;
जलन होती है क्या, आग सीने मे लगाकर देखो.

वो 'मुसाफिर' से पूछते है की हाले दिल क्या है;
हालेदिल क्या है, ये मुझसे दिल लगाकर देखो.

जीवन सफ़र

 सबके अपने रास्ते अपने अपने सफ़र  रास्तों के काँटे अपने  अपने अपने दर्द अपनी अपनी मंज़िल अपना अपना दुख अपनी अपनी चाहते अपना अपना सुख सबकी अप...