तुम मुझे भूले नहीं ये जानकार अच्छा लगा


तुम मुझे भूले नहीं ये जानकार अच्छा लगा;
जैसे किताबों में फूल, सूखे ही सही काफ़ी तो हैं.

मिल न सके हम,यादों का आना अच्छा लगा;
डूबे न किनारे, लहरों का छू जाना काफ़ी तो है.

दौड़ कर तुमसे लिपट जाऊँ ख़याल अच्छा लगा;
मुझको छूकर तुम तक गई,ये हवा काफ़ी तो है.

मैं एक क़तरा जिंदगी, तुम समंदर अच्छा लगा;
तुम नहीं न सही, अश्को का समंदर काफ़ी तो है.

Comments

  1. खूबसूरत ख्याल्।

    ReplyDelete
  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
    Replies
    1. चर्चा मंच के माध्यम से दूसरों तक पहुँचाने के लिए आभार!!
      प्रणाम

      Delete
  3. बहुत सुन्दर अहसास...

    ReplyDelete
  4. भावभीनी पोस्ट है बधाई|

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपके यहाँ निरंतर आगमन की अपेक्षा है.
      आभार.
      प्रणाम

      Delete

Post a Comment

Popular posts from this blog

शाम है और गुफ़्तगू भी

'I' between me and myself

खुद को ही पाउँ