Saturday, 10 March 2012

तुम मुझे भूले नहीं ये जानकार अच्छा लगा


तुम मुझे भूले नहीं ये जानकार अच्छा लगा;
जैसे किताबों में फूल, सूखे ही सही काफ़ी तो हैं.

मिल न सके हम,यादों का आना अच्छा लगा;
डूबे न किनारे, लहरों का छू जाना काफ़ी तो है.

दौड़ कर तुमसे लिपट जाऊँ ख़याल अच्छा लगा;
मुझको छूकर तुम तक गई,ये हवा काफ़ी तो है.

मैं एक क़तरा जिंदगी, तुम समंदर अच्छा लगा;
तुम नहीं न सही, अश्को का समंदर काफ़ी तो है.

8 comments:

  1. खूबसूरत ख्याल्।

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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    1. चर्चा मंच के माध्यम से दूसरों तक पहुँचाने के लिए आभार!!
      प्रणाम

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  3. बहुत सुन्दर अहसास...

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  4. भावभीनी पोस्ट है बधाई|

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    1. आपके यहाँ निरंतर आगमन की अपेक्षा है.
      आभार.
      प्रणाम

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