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Showing posts from February, 2012

गर्दिश-ए-शाम बन गया हूँ मैं

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गर्दिश-ए-शाम बन गया हूँ मैं;  तेरे पहलू से जो उठ गया हूँ मैं.
आईना देखता हूँ, मैं तुझको पाता हूँ; कि नज़र हो तेरी, और बयाँ हूँ मैं.
अपना साया भी तो अपना न रहा; बिछुड़ के तुझसे यूँ तन्हा हूँ मैं.
ज़ख्म तेरा हो या मेरा हो; अपने इस दिल मे जी रहा हूँ मैं.
है 'मुसाफिर', है मोहब्बत का सफ़र; आश है तेरी तो चल रहा हूँ मैं.

काश मैं बदल सकता वक़्त

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गुज़रते हुए देखें हैं, साल कई; गुज़रते हुए देखें हैं, लोग कई.
पर दर्द असहनीय और गहरा देखा; जब बेटे को पिता के कंधों पर जाता देखा.
काल से पूछता हूँ, क्या वो भी है किसी का बाप; या सिर्फ़ बना है, ऐसों के लिए अभिशाप.
सुना है आत्मा अजर है, अमर है; किंतु नही समझना चाहता इसे.
सिर्फ़ समझना चाहता हूँ वो दुख; जब देखता हूँ, अश्रु पूरित नेत्र.
नही है कोई अधिकार; नही बदल सकता मैं वक़्त.
पर काश मैं बदल सकता ..............