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मृत्यु तुम से बिना डरे

हाँ किसी रोज़
देखना चाहता हूँ
सुंदर संगीत

किसी रोज़ सुनना चाहता हूँ
किसी की
सुंदर चित्रकारी

किसी रोज़
जी लेना चाहता हूँ
प्रेम में लिखी कविता को

किसी रोज़ भटकना चाहता हूँ
कहानियों की
भूल भुलैया में

बतियाना चाहता हूँ
पास से गुज़रती हुई
छू जाती हवा से

महसूस कर लेना चाहता हूँ
सागर की लहरों को
मन में उठते तरंगों की तरह

और कभी ख़ुद को ख़ुद के भीतर
खींचकर पैदा कर देना चाहता हूँ
सितार का संगीत

और साँसों को एक शांत
अंधेरी रात को
एकांत में ठहरे देखना चाहता हूँ

हाँ मृत्यु, तुम से बिना डरे
जीवन जैसा ही मिलना चाहता हूँ
मैं तुम से

ज़िंदगी कम है क्या कि मौत की कमी होगी

दुबारा इश्क़ की दुनिया हरी भरी होगी
वो मिल भी जाए तो क्या अब मुझे ख़ुशी होगी - © भाई Irshad Khan Sikandar
अंधेरों के बाद, फिर जो रोशनी के साथ
मिल भी गए तो क्या पहले जैसी ख़ुशी होगी

दुनिया दूर से ख़ूबसूरत जो बहुत है
पास जाने पर भी क्या उतनी ही हँसी होगी

ज़माना पहले अलविदा कहा था जहाँ
अगली मुलाक़ात भी क्या वहीं होगी

आँखो का अश्क़ जो मोहब्बत में ठहर जाता है
तो वक़्त को भी क्या महसूस वो नमीं होगी

तुम सफ़र में हो 'मुसाफ़िर' पूरा कर ही लो
ये ज़िंदगी कम है क्या कि मौत की कमी होगी © Gyanendra

प्रेम की परिभाषाएँ

प्रेम की सारी परिभाषाएँ
तुम पर आ कर
पेड़ के पीले पड़ गये पत्तों सी
पतित हो जाती हैं

प्रेम के एक क़तरा अनुभव के आगे
शब्दों का सारा समुद्र
जैसे रेगिस्तान सा लगता है

जीवन की सारी विषमताओं
और कष्टों के अंधेरों के बीच
प्रेम की अकेली किरण
सब कुछ रोशन कर देती है

प्रेम सुबह के ओस सी
पलकों के कोरों पर ठहर जाती है
तो कभी मन चित्त और प्राण में
प्रार्थना बन कर तरंगित हो जाती है

सूक्ष्म अति सूक्ष्म कणों तक
प्रेम आत्मिक अनुभव रूप में
ठहर जाता है जीवंत होकर
जीवन पार की यात्राओं में

हम ने गुलाब-ए-अश्क़ भी देखे है यहाँ पर

तुम दूर सही दूर से भी बात अगर हो
लहरों का साहिल से मुलाक़ात अगर हो

मुनासिब हो तो ठहरो की है शाम अभी दूर
ज़िंदगी की सुबह है, समझदार अगर हो

मरने की ख़्वाहिश तो जीने का शग़ल है
बीमार ही बीमार हो तीमार अगर हो

हम ने गुलाब-ए-अश्क़ भी देखे है यहाँ पर
काँटों की वजूद पर जो वार अगर हो

हम छोड़ भी दे रास्ता, और नाम 'मुसाफ़िर'
यादें न हो, ये ज़िंदगी सफ़र न अगर हो