Monday, 12 March 2012

रात जम के बारिश तो हुई


यहाँ,रात जम के बारिश तो हुई;
पर दिल का आँगन सूखा ही रहा.

महफ़िल में लोग भी आए थे;
पर महफ़िल दिल का सूना ही रहा.

मेरी आँखे तो थीं ढूढ़ रही;
पर मेरा आईना तो झूठा ही रहा.

वो एक समंदर है मेरा;
मैं एक दरिया सा बहता ही रहा.

फूलों का ख्वाब सजाए हुए;
मैं काँटों का साथ देता ही रहा;

पल साथ मिले जी भर जी लूँ;
तिल तिल कर पल जीता ही रहा.

6 comments:

  1. बहुत खूबसूरत अहसास

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    1. ये गम मेरा अपना तो नहीं, से सबका रहा है मुद्दत से;
      बस फ़र्क यहाँ पर इतना है, मैने है जिया इसे सिद्दत से. © Gyanendra

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  2. बहुत खूब ... मन के आँगन बारिश नहीं मन की बूंदों से भीगते हैं ...
    अच्छी अचना है मुसाफिर जी ...

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    1. आपको पसंद आई ये रचना जान कर अच्छा लगा .
      सहृदय आभार.

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  3. आभार!!
    प्रणाम

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