Thursday, 16 February 2012

गर्दिश-ए-शाम बन गया हूँ मैं


गर्दिश-ए-शाम बन गया हूँ मैं; 
तेरे पहलू से जो उठ गया हूँ मैं.

आईना देखता हूँ, मैं तुझको पाता हूँ;
कि नज़र हो तेरी, और बयाँ हूँ मैं.

अपना साया भी तो अपना न रहा;
बिछुड़ के तुझसे यूँ तन्हा हूँ मैं.

ज़ख्म तेरा हो या मेरा हो;
अपने इस दिल मे जी रहा हूँ मैं.

है 'मुसाफिर', है मोहब्बत का सफ़र;
आश है तेरी तो चल रहा हूँ मैं.

Thursday, 2 February 2012

काश मैं बदल सकता वक़्त


गुज़रते हुए देखें हैं, साल कई;
गुज़रते हुए देखें हैं, लोग कई.

पर दर्द असहनीय और गहरा देखा;
जब बेटे को पिता के कंधों पर जाता देखा.

काल से पूछता हूँ, क्या वो भी है किसी का बाप;
या सिर्फ़ बना है, ऐसों के लिए अभिशाप.

सुना है आत्मा अजर है, अमर है;
किंतु नही समझना चाहता इसे.

सिर्फ़ समझना चाहता हूँ वो दुख;
जब देखता हूँ, अश्रु पूरित नेत्र.

नही है कोई अधिकार;
नही बदल सकता मैं वक़्त.

पर काश मैं बदल सकता ..............

Friday, 30 December 2011

जिंदगी का राज


मुझे ये जिंदगी का राज समझ आया करीने से,
कि खुश्बू फूल की आती है मेहनत करके जीने से।

तुम्हे कतरा कह कर लोग ठुकराए तो भी क्या,
समंदर बनके निकले मोहब्बत,बूँद के ही सीने से.

रोटी बनती नही है रुपये दौलत या नगीने से.
आगर न सीँचे मिट्टी आदम का घीसू पसीने से।

घुटन सी एक मैं महसूस करता हूँ शहरों मे,
यहाँ अब दिन गुज़रते है बरसों या महीने से.

चलो रुख़ कर लो 'मुसाफिर' गावों की तरफ फिर से,
मिला है क्या तुम्हे इस शहर मे घुट घुट के जीने से.

Friday, 28 October 2011

जिंदगी क्या है


जिंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो;
मोहब्बत क्या है किसी को अपना बनाकर देखो.

सफ़र जिंदगी का है नये रास्तों से ही;
जिंदगी क्या है,नये रास्ते बनाकर देखो.

समंदर के सीने मे मौज है कितनी;
समंदर के सीने मे तुम समाकर देखो.

तुम समझ न सकोगे दूरियो की तड़प को;
अंधेरा होता है क्या, रोशनी को हटा कर देखो.

आग होती है क्या, हर तरफ धुआँ सा लगता है;
जलन होती है क्या, आग सीने मे लगाकर देखो.

वो 'मुसाफिर' से पूछते है की हाले दिल क्या है;
हालेदिल क्या है, ये मुझसे दिल लगाकर देखो.

Sunday, 25 September 2011

मैं तुमसे अलग!


शाखों से अलग पत्ते,
हवा के हल्के झोंके से दूर चले जाते हैं।
मैं तुमसे अलग,
इतना जड़ कैसे हूँ।

जंगल में पेड़ से अलग सूखे पत्ते,
यूँ ही जल जाते हैं।
मैं तुमसे अलग ,
अब तक जला क्यों नहीं।

समंदर से अलग हुई लहर,
अपना अस्तित्व खो देती है।
मैं तुमसे अलग,
खुद का होना सोचूँ कैसे।

Wednesday, 14 September 2011

तुम सुगंध हो मेरी


तुम सुगंध हो मेरी
मैं पवन हूँ तेरा
मिल तू जाए अगर
तो ये जीवन मेरा ।

चाँद को चाहिए
चाँदनी, और क्या
तू नहीं है तो फिर
क्या ये जीवन मेरा ।

है मेरे जो नयन
अश्रु पूरित यहाँ
मन में मेरे जो है
बस वो चेहरा तेरा ।

शाम की रोशनी
मुझको अच्छी लगे
पास तू है नहीं
न सुबह का उजाला तेरा ।

आश दिल में मगर
है एक बाकी अभी
वो बन के आये
सुबह का उजाला मेरा ।

Wednesday, 17 August 2011

मेरे कातिल


पास आ कातिल मेरे मुझमें जान आने दे,
जान ले लेना पर थोडा तो संभल जाने दे।

तू तसव्वुर में मेरे रहा है बरसों से,
खुद को नजरों से सीने में उतर जाने दे।

कुछ ठहर जा कि छुपा लूँ मैं दर्द सीने का,
या तेरे सीने से लिपट कर बिफर जाने दे।

तुझको पाना नहीं है मेरी मंजिल,
तू जरा खुद में मुझको समां जाने दे।

अब गुजारिश है 'मुसाफिर' की खुदा से,
वो मुझे मेरे खुदा से ही मिल जाने दे।

जीवन सफ़र

 सबके अपने रास्ते अपने अपने सफ़र  रास्तों के काँटे अपने  अपने अपने दर्द अपनी अपनी मंज़िल अपना अपना दुख अपनी अपनी चाहते अपना अपना सुख सबकी अप...