सभ्यतायें

सभ्यताएँ
जो नहीं रोप पाती है
प्रेम के बीज
समाज में और
आने वाली पीढ़ी में
वो मर जाती हैं

सभ्यतायें जो नहीं दे पातीं हैं
दिशा, समन्वय और सौहार्द का
उन का अंत हो जाता है

सभ्यतायें जो सिर्फ़ दे जातीं है
झूठा अभिमान और झूठा गर्व
काल के पटल पर रह जाती है
बन कर एक बीता इतिहास

सभ्यतायें गतिमान होती है
नये के साथ पुराने का समन्वय से
वो हत्यायें नहीं करतीं है
वो प्रेम को जीवंत कर देती है

सभ्यतायें वो नहीं है
जो तुम तय करते हो
देश, व्यवस्था, धर्म और जाति से
सभ्यतायें जन्म लेती है मानवता से
शांति और प्रेम से

Comments

Popular posts from this blog

ख़्वाब के पार

विरह गीत

मृत्यु तुम से बिना डरे