Monday, 30 May 2011

मुकद्दर


वो मुकद्दर में है नहीं मेरे;
कह पाया हम तो हैं तेरे

यूँ खामोश चेहरा वो मुझे दीखता है;
जैसे आइना सामने पड़ा हो मेरे

शाम के साथ मै भी ढलता हूँ;
वो रौशनी जो साथ नहीं है मेरे

य़ू तो कट ही जायेगा जिंदगी का सफ़र;
मौत जायेगी चुपके से जहन में मेरे

मै सोचता था पा लूं मै मरने का सुकून ;
कि मौत आये पर हो उनकी बाँहों के घेरे

3 comments:

  1. बहुत बढ़िया विरह रचना लिखी है आपने!

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  2. बहुत खूब....
    हो सनम की बाहों में जो,
    वो मौत क्या मौत होती है।
    हज़ार ज़िन्दगियों से भी हसीं,
    ज़िन्दगी, वो मौत होती है ॥

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