Sunday, 22 May 2011

विरह गीत


काँहें गये परदेश सजनवा ;
मनवा मोरा अधीर भवा।
देख रहे नित राह सजन के;
नयनन से नित नीर बहा।
काहें गये परदेश सजनवा.....

खोज रही मैं प्रीत की डारी;
मन चिरिया को ठौर कहाँ।
देखत बिम्ब द्वार पर जैसे;
मन सोचे है आये सजनवा।
काहें गये परदेश सजनवा.........

सिथिल नयन और याद सजन के;
मन छाये कारे दुःख के बदरवा।
घर सारा अँधियारा जग है;
तुमको कहाँ अब ढूढे नयनवा।
काहें गये परदेश सजनवा..........

बरस पड़े फिर टूट के बादल;
जब घर आये लौट सजनवा।
लिपट गये तन प्रेम में आतुर;
जैसे मिले हों नदी सगरवा।
अब तो यही मैं माँगू रब से;
अब न जाये परदेश सजनवा .....

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर लयबद्ध गीत!
    --
    आपने जो कमेंट किया है वो रचना नहीं,
    अंग्रेजी रचना का अनुवाद है!

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  2. कम शब्दों में सुंदर भाव-अभिव्यक्ति...खूबसूरत भाव संजोए एक बेहतरीन रचना..अच्छी लगी..धन्यवाद

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  3. आजकल तो हमारे ब्लॉग पर भी नहीं आ रहे हो!

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  4. परदेश जाने का विरह और सपने जिंदगी के मोड पर हमेशा कुछ टीस छोड़ जाती है. इस टीस एवं आस को देशज भाषा के शब्दों की चासनी में घोल कर कमाल का जादू किया है. हो सके तो कभी उस मज़बूरी को भी कविता में बयाँ कीजिए, जहाँ पतंगे आसमान में उड़ने से थक हार कर जमीन में अपने उड़ाने वाले हाथों में लौटना चाहता है, लेकिन अमूमन समय की आंधी में उसकी परिणीति कट कर किसी कोने में विलुप्त हो जाने में होती है. धन्यवाद

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  5. बढ़िया विरह गीत.क्या बात है.

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  6. gavayi khushbu ka swad mila, badhai

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