Wednesday, 18 May 2011

हाथ मेरे ये ग़म का खज़ाना है लगा


हाथ मेरे ये ग़म का खज़ाना है लगा,
दुनिया मुझको ये एक वीराना है लगा।

दिल की है बात तो समझना भी मुश्किल है,
रोग मुझको जो मोहब्बत का पुराना है लगा।

मंजिले और भी थीं ग़म--जिंदगी के लिये,
पर मेरे दिल पे ही ग़म का निशाना है लगा।

समंदर है, साहिल है, है लहरों का सफ़र,
साहिल--दिल पर यादों का आना है लगा।


(कुछ निजी व्यस्तताओं और ब्लॉग की अव्यवस्था के कारण यह पोस्ट लगाने में कुछ देर हो गया,
इसके लिए माफ़ी चाहूँगा)

6 comments:

  1. ज्ञानेन्द्र जी, मैं आपके ब्लाग पे आया। आपकी कई रचनाएं देखीं। बहुत अच्छी लगी हैं। भावना के स्तर पर भी, अभिव्यक्ति के स्तर पर भी। अपने जीवन के अनुभवों से मैंने जाना है कि कोई भी कृति वही प्राणवन्त हो सकती है, जहां साहित्य और अध्यात्म एक क्षितिज पर मिलते हों। आत्मीय मंगलकामनाएं।

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  2. वाह ... बहुत ही खूबसूरत शब्‍दों का संगम इस रचना में ।

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  3. भावना प्रधान रचना,वाह ज्ञानेंद्र जी वाह.

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