Thursday, 8 October 2015

तुम्हारी कविता के शब्द,दलाल के शब्द जान पड़ते है

जब मैं तुम्हारी बाज़बजाती गंधाती सोच को सुनता हूँ
तो मुझे तुम्हारी कविता के शब्द
उस दलाल के शब्द जान पड़ते है
जो एक स्त्री को वेश्या कह कर
उस की कीमत लगा रहा होता है
सत्ता के गलियारों में
लखटकिया पुरस्कार में बिक चुकी
तुम्हारी बेगैरत सोच मुझ में नफ़रत पैदा करती है
जब लोगों के कानों में एक व्यक्ति की चींख गूँजती है
जब उस की मौत कइयों को डर से सोने नहीं देती
तब तुम्हारी कविता मछली और सागर की बात करती है
तब मुझे तुम्हारे शब्द नीरो के कानफोड़ू बांसुरी जैसे लगते है
तुम्हारी कविता प्रेम और परमात्मा की बात करती है
तब मुझे लगता है की ये शब्द झूठे है
जो महसूस नहीं कर पता है उस चींख को
वो कैसे दावा करता है प्रेम और परमात्मा की
तुम्हारे चरित्र और तुम्हारी कविता दोनों भौंडे लगते हैं

6 comments:

  1. सच कहता हूँ ....ये एक बेहद बेहद ( एक और बार बेहद ) अच्छी कविता है ज्ञानेंद्र जी ! बधाई ....बस ऐसे ही लिखते रहिये !

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    1. सप्रेम आभार !!!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (10-10-2015) को "चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज" (चर्चा अंक-2125) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आज का कवि शब्दों की दलाली में अधिक विश्वास करता है .

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    1. प्रणाम स्वीकार करें !!!

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