स्तब्ध, निरुत्तर और निर्जीव!!!

मुश्किल होता है समझ पाना
या की खुद को समझा पाना
जब आप किसी के साथ चल रहे हो
और उस के साथ होने का एहसास हो
और तभी वो बिना कुछ कहे
यूँ आहिस्ता से आप से दूर चला जाए
और कुछ भी समझना मुश्किल हो
बस आप खड़े रह जाए
स्तब्ध, निरुत्तर और निर्जीव!!!

Comments

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 12 अक्टूबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (12-10-2015) को "प्रातः भ्रमण और फेसबुक स्टेटस" (चर्चा अंक-2127) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. जुदाई हमेश से ही बुरा अनुभव होती है.

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  4. साथ चलने वाला जब हमें अच्छा लगने लगता है तब उसका दूर होना अखरता है मन को ..
    बहुत बढ़िया मनोभाव

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