Monday, 25 February 2013

देखता हूँ ये कैसी मेरी लाचारी है.

देखता हूँ ये कैसी मेरी लाचारी है.
दिल की दरख्तों में तस्वीर तुम्हारी है;

कच्ची अमिया खाने का भी मन है;
नाकसीर फूटने की तुझको बीमारी है.

दूर जा कर भी छूट न पाएगी;
तेरे मेरे मन की लगी जो यारी है.

तुम हो तराजू लाए बाट नहीं लाये;
'प्यार' तौलने की तुम्हे बीमारी है.

कैसे मिलोगे और कहाँ ये बतला दो;
नाम की नहीं मुझको तेरी दरकारी है.

राहें रहें मिलती 'मुसाफिर' बस क्या;
मंज़िल की नहीं कोई नशातारी है.

5 comments:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार26/2/13 को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका हार्दिक स्वागत है

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    1. आदरणीया राजेश जी,
      बहुत बहुत आभार!!!

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  2. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,आभार.

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  3. बहुत गजब बहुत अच्छी रचना आन्नद मय करती रचना
    आज की मेरी नई रचना

    ये कैसी मोहब्बत है

    खुशबू

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