Wednesday, 3 October 2012

मजबूर आदमी













हर जगह मजबूर होता आदमी;
इंसानियत से दूर होता आदमी.

फिर बचाने को अपना वजूद;
आदमी से जूझता है आदमी.

दौड़ता है, भागता है भीड़ में;
आदमी को रौंदता एक आदमी.

शहर की गहरी अंधेरी जिंदगी;
खुद को कहाँ पहचानता है आदमी.

22 comments:

  1. होय पेट में रेचना, चना काबुली खाय ।

    उत्तम रचना देख के, चर्चा मंच चुराय ।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति... सुप्रभात!

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  3. एकदम सही..
    अति उत्तम रचना..
    :-)

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    1. जी बहुत बहुत आभार!!!

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  4. कल 12/10/2012 को आपकी यह खूबसूरत पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. मेरी रचना ज्यादे लोगों तक पहुँचाने के लिए आपका आभार !!!

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  5. बिलकुल सही फ़रमाया आपने .

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  6. बहुत खूब लिखा है आपने | आभार |

    नई पोस्ट:- ओ कलम !!

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    1. बहुत बहुत आभार !!!

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  7. सत्य हा आदमी आदमी को कहां पहचान रहा है.. http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com

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  8. बेहद सुन्दर रचना....

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    1. श्री प्रकाश जी आपका सहृदय आभार !!!
      हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया.
      प्रणाम!

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  9. बहुत बढ़िया

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    1. सहृदय आभार !!!
      प्रणाम!

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