Wednesday, 24 October 2012

समझने को कहाँ कुछ भी रहा अब


समझने को कहाँ कुछ भी रहा अब;
कब  वो समझा अपना, मेरा रहा कब.

कि खुद में जलने का भी मज़ा है;
मैने उस से शिकायत ही किया कब.

गैर होकर भी जो लगता था अपना;
अपना होकर वो गैर ही हुआ अब. 

जाँच तफ़सील से ज़रा कर लो तुम;
दिल मेरा था कभी उसका हुआ अब.

'मुसाफिर' हूँ अंधेरों से नहीं डरता हूँ;
अंधेरा अपना रहा, उजाला हुआ कब.

4 comments:

  1. शुक्रिया दोस्त .छा गए टिपियाने में मर्म समझ गए बतियाने का .

    जांच तफसील से कर लो ,

    दिल मेरा था कभी ,उसका अब हुआ .

    बहुत खूब अशआर है ,दाद ही दाद है .

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    1. आभार!!!
      अशआर आपके दिल तक पहुंचे बस यही कामयाबी है.

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  2. मैंने उससे शिकायत किया ही कब .
    खुद में जलने का भी मजा है .

    शुक्रिया दोस्त टिपण्णी का .आदाब .

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    1. आभार!!!
      प्रणाम

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