Monday, 5 May 2014

फ़ुर्सत में कहां हूं मैं


मैं समंदर हूं कि हवा हूं मैं;
नहीं हूं खुद में तो कहाँ हूं मैं|

लम्हें वो जिनको ज़ी नहीं पाया;
उन ही लम्हों को जोड़ता हूँ मैं|

सांस बिखरी हों या तेरी यादें;
एक तड़फ़ है जो ज़ी रहा हूं मैं|

एक अरसा हुआ देखे तुझको;
अरसा पहले ये पल जिया हूं मैं|

मिलना फ़ुर्सत से सफ़र के बाद;
'मुसाफिर' हूं फ़ुर्सत में कहां हूं मैं|

Saturday, 3 May 2014

कुछ साँसों को जिंदगी से अलग कर दूं


चाहता हूं कुछ साँसें अपनी जिंदगी से अलग कर दूं
वो जो तुम्हारी यादों के साथ ली थी मैं ने
और जिनके साथ घुली हवा मेरे रक्त में समा गयी
जो मेरे रक्त के साथ सीने से होते हुए
मेरे दिल और दिमाग़ में अपनी जगह बना चुकी है
और जिसने तुम्हारे यादों का असर और गहरा कर दिया है
मैं चाहता हूं तुम्हारी याद का हर असर ख़त्म कर दूं
मैं चाहता हूं कुछ साँसों को अपनी जिंदगी से अलग कर दूं

Sunday, 26 January 2014

इस दुनियावी सफ़र में अब रखा क्या है.

सफ़र है जिंदगी, और यहाँ होता क्या है;
जो भी मिलता है, वो भी मिलता क्या है.

जिंदगी के सफ़र पर निकले हो तुम;
सिवा मौत के अपना पराया क्या है.

एक मोहब्बत ही तो है दिल मे तेरे;
लूटा दे यूँ भी पास तेरे रखा क्या है.

समझना था राह की मुश्किलों को तुम्हें;
और समझना था की ये दुनिया क्या है.

घर को लौट ही चल 'मुसाफिर' अब तूँ;
इस दुनियावी सफ़र में अब रखा क्या है.

Saturday, 30 November 2013

एहसास


जब भी एहसास इतने गहरे हुए 
कि ज़ुबान बयाँ न कर सके 
मुझे मेरा मौन अच्छा लगा
लहरों की आवाज़ और पंछी की चहक अच्छी लगी
और लगा की खुद के होने के अहम से
कहीं अच्छा है, खुद के न होने  का एहसास 

Thursday, 24 October 2013

ओ साधु रे ........













ओ साधु रे ........
ओ साधु रे ........

साधु नाम पाया, लेकिन जिया कहाँ रे.
रे साधु जिया कहाँ रे.

साधु मन पाया, लेकिन बचा कहाँ रे.
रे साधु बचा कहाँ रे.

जले तन तपे मन तो साधु बना रे.
हाँ साधु बना रे.

दुनिया के फेरे में फिर जाने कहाँ रे.
साधु जाने कहाँ रे.

मन फेरा साधु तो तूँ बचा कहाँ रे.
साधु बचा कहाँ रे.

फिर से जी ले जीवन ज़रा ओ प्यारे.
साधु हो जा रे.

तन से न बन, बन मन से साधु रे.
ओ साधु रे ....
ओ साधु रे ....



Friday, 11 October 2013

दर्द यूँ भी अदाओं से कम निकलता है.

यमुना प्रसाद दूबे 'पंकज' जी ने आग़ाज किया था उसी को अंजाम देने की कोशिश है। 

ग़ज़ल का मतला,ख़ास आप की महफिल के लिये
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रूह जलती है,तब पिघलता है।
दर्द,यॅू ही नही निकलता है।














चाँद और हम काँपते है रात भर छत पर;
वो मेरा चाँद है जो बहुत कम निकलता है.

हँसते है हम भी नमी आँखों में ले कर;
दर्द यूँ भी अदाओं से कम निकलता है.

तुम मिलोगे तो करेंगे बहुत सारी बातें;
देखो किस दिन ये मुक़द्दर मेरा निकलता है.

हाँ दर्द से मेरे सभी ही हैं थोड़ा संजीदा;
कि गैर के दर्द से जान कब निकलता है.

हो गयी शाम जब जिंदगी की ढलते ढलते;
'मुसाफिर' फिर कोई घर से कहाँ निकलता है.

Friday, 13 September 2013

बहुत अदना सा रह गया है इंसान

बहुत अदना सा रह गया है इंसान
तुम्हारे अल्लाह और तुम्हारे भगवान के आगे
उसे मरना पड़ता है
कभी तुम्हारे अल्लाह के नाम पर
कभी तुम्हारे भगवान के नाम पर
और जब कोई कहता है
कि तुम मार दो अपने अल्लाह को
और तुम भी मार दो अपने भगवान को
जिसे एक इंसान ने पैदा किया था
तो तुम दोनों मिलकर मार देते हो उस इंसान को
क्यों की खुद इंसान होकर भी
तुम्हे लगता है तुम्हारा अल्लाह बड़ा है
तुम्हारा भगवान बड़ा है.

जीवन सफ़र

 सबके अपने रास्ते अपने अपने सफ़र  रास्तों के काँटे अपने  अपने अपने दर्द अपनी अपनी मंज़िल अपना अपना दुख अपनी अपनी चाहते अपना अपना सुख सबकी अप...