इस दुनियावी सफ़र में अब रखा क्या है.

सफ़र है जिंदगी, और यहाँ होता क्या है;
जो भी मिलता है, वो भी मिलता क्या है.

जिंदगी के सफ़र पर निकले हो तुम;
सिवा मौत के अपना पराया क्या है.

एक मोहब्बत ही तो है दिल मे तेरे;
लूटा दे यूँ भी पास तेरे रखा क्या है.

समझना था राह की मुश्किलों को तुम्हें;
और समझना था की ये दुनिया क्या है.

घर को लौट ही चल 'मुसाफिर' अब तूँ;
इस दुनियावी सफ़र में अब रखा क्या है.

Comments

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (28-01-2014) को "मेरा हर लफ्ज़ मेरे नाम की तस्वीर हो जाए" (चर्चा मंच-1506) पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    Replies
    1. रचना को ज्यादे से ज्यादे लोगों तक पहुँचाने के लिए बहुत बहुत आभार|
      प्रणाम स्वीकार करें.

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  2. बहुत सुन्दर.....

    ReplyDelete

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