Sunday, 26 May 2013

मौन सहमति नही थी, विरोध था।














मौन सहमति नही थी, विरोध था।
पर तुम मौन नही समझते,
तुम भूख और तड़प नही समझते।
नही सुना तुमने जब मौन
तब हमने लिया है सहारा बंदूको का,
ताकि तुम्हारे कान खुल सके।
तुम्हे भी महसूस हो पीड़ा अपनों को खोने की,
पर शायद तुम्हें शरीर की भूख और अपनों का दर्द ही समझ आता है।
ऐसे मे हम कहाँ जायें,
तो ऐसे में हमारी बंदूके हमारी आवाज़ है,
इनसे चली गोलियां शायद तुम्हें याद दिला सकें की हमारे लोग भी यूं ही तड़प के मरे थे,
तुम्हारी गोलियों से।
और उनका कसूर सिर्फ ये था की वो तुम्हारी तरह पढ़ें लिखें नहीं थे।
वो इंसान तो थे पर तुम जैसे धूर्त नहीं थे।
उन्हें अपनी मिट्टी से प्रेम था,
जिसका तुम सौदा करना चाहते थे।
सत्य यही है, तुम इस देश का भी सौदा कर सकते हो।

Thursday, 28 March 2013

गम की धूप, छाँव खुशी की मिली होती


गम की धूप, छाँव खुशी की मिली होती;
थोड़ा आसमान थोड़ी ज़मीन मिली होती.

कहाँ माँगता हूँ,चाँद मिले आँचल में;
चाहतें थी थोड़ी रोशनी मिली होती.

दौड़ता भागता रहा जिंदगी के लिए;
दौड़ते भागते ही जिंदगी मिली होती.

तुम से बेहतर यक़ीनन कोई  ख़याल न था;
हक़ीकत में भी अगर तुम कहीं मिली होती.

अमीरी भी 'मुसाफिर' को मिल गयी होती;
मुसाफ़िरी जो कहीं फकीरों की मिली होती.

Tuesday, 26 March 2013

शुभ होली
















हंस हंस के
फिर हँसी ठिठोली

उड़ी गुलाल
रंग भी घोली

चिल्ला के
बच्चों की टोली

बोली ज़ोर से
फिर ये बोली

बचना मना
न दो अब गोली

रंग पड़ेगा तब बोलेंगे
शुभ होली-शुभ होली

रंगरेजवा

मोरे रंगरेजवा 
तोरे बिना होली बेकार रे!

गूलर जइसन लाल,
कनेरवा जइसन पीयर,
कई दे मनवा हरियर पीयर,
तोरे बिन सब रंगवा भईल बेकार!
मोरे रंगरेजवा 
तोरे बिना होली बेकार रे!

तन तो रंगाई,
मोरा मन न रंगाई,
मन के रंगाए बिना,
सब बेकार रे!
मोरे रंगरेजवा 
तोरे बिना होली बेकार रे!

नील ई आकाशवा,
हरियर धरतिया,
तोहरे ही रंग मे गईल सब रंगाई रे!
मोरे रंगरेजवा 
तोरे बिना होली बेकार रे!

सांवर भय तो जाईसे किशन के लेखिन,
मन रंग दे कि जैसे उजियार रे!
मोरे रंगरेजवा 
तोरे बिना होली बेकार रे!

Wednesday, 13 March 2013

सोचता हूँ आया था क्या ले कर

सोचता हूँ आया था क्या ले कर;
जाऊंगा जहाँ को मैं क्या दे कर.

मिलने का अंदाज अलग होता है;
लोग वो मिलते है फासला ले कर.

शाम ढलती है मैं भी ढलता हूँ;
फिर सम्हलता हूँ हौसला ले कर.

दुनिया में इंसान वो भी होते हैं;
खुश होते है दर्द किसी का ले कर.

जब दर्द सीने का हद से पार हुआ;
ज़मीन आती है ज़लज़ला ले कर.

तुम 'मुसाफिर',ये जिंदगी है सफ़र;
चलो काँधे पे सलीब अपना ले कर.

Thursday, 28 February 2013

माँ फिर से अपना आँचल कर दो



कितने सारे दर्द हैं
जिनको जीता हूँ
दुनिया कहती है
मैं बड़ा हो गया हूँ
खुश होता हूँ मैं
जब बच्चा होता हूँ
माँ फिर से अपना आँचल कर दो
माँ मुझ को फिर से बच्चा कर दो

आदमी भी बिक रहा है














हमारे बाजार बड़े हुए हैं 
खरीद फ़रोख़्त बढ़ गयी है
अब तो आदमी भी बिक रहा है
और उसका जमीर भी
सिक्के भारी होते थे
फिर भी नहीं खरीद पाते थे आदमी को
या कि उसके जमीर को
ये नया दौर है
वक़्त की तराजू में तौल दिए जाते है
हलके नोटों के बदले
हलके होते आदमी और उनका जमीर

जीवन सफ़र

 सबके अपने रास्ते अपने अपने सफ़र  रास्तों के काँटे अपने  अपने अपने दर्द अपनी अपनी मंज़िल अपना अपना दुख अपनी अपनी चाहते अपना अपना सुख सबकी अप...