Sunday, 6 May 2012

खोजता हूँ खुद को खुद को जानता नहीं.

इस तरफ भी वही है, वो ये मानता नहीं;
कैसे हों पार तैरना तो जानता नहीं.

अब तक मेरे वजूद को झुठला रहा है वो;
कहता है कि मुझ को पहचानता नहीं.

मैने कहा मैं बस मोहब्बत का पैगाम हूँ;
वो, मोहब्बत है क्या ये जानता नहीं.

जाना ये जब से दिल में इबादत का दौर है;
उसके सिवा कुछ भी मैं माँगता नहीं.

दुनिया की दौड़ तो है मंज़िल की चाह में;
उसके बगैर मंज़िल कोई मैं जानता नहीं.

मैं दौड़ता 'मुसाफिर' इस पार से उस पार;
खोजता हूँ खुद को खुद को जानता नहीं.

Sunday, 25 March 2012

जिंदगी पूछ ही लेती है जीने का सबब

हर कदम चल के,मैं सोचता हूँ,ये क्या हुआ;
जब ठहरता हूँ,तो पूछता हूँ,अब क्या हुआ.

तू दौड़ कर बहुत दूर निकल जाए तो क्या;
देखना तुझपे,तेरे होने का असर क्या हुआ.

मुश्किलें आएँगी तो आए सफ़र के दौरान
जो आसान ही हुआ तो फिर सफ़र क्या हुआ.

जिंदगी पूछ ही लेती है जीने का सबब यूँ;
कि तमाम उम्र गुज़ार ली हासिल क्या हुआ.

जिसे तू तजुर्बा कहता है,वो तेरा अपना नहीं;
जो जमाने से मिला है,वो तेरा अपना न हुआ.

वो जाने की राह तो आने से अलग होगी ही;
आने-जाने के दर्मयाँ तेरा अपना क्या हुआ.

क्या मिला है 'मुसाफिर' इस सफ़र के दौरान;
जो तेरा खुद का रहा हो ऐसा तजुर्बा क्या हुआ.

Friday, 23 March 2012

और मैं!!

१. अझुली भर फूल/
प्यार भरा दिल/
आकाश मे उड़ता पंछी/
और मैं.

२. बहती हुई नदिया/
उड़ता हुआ बादल/
हवाओं मे खुशबू/
और मैं.

३. पेड़ पर पत्ते/
पत्ते पर बारिश/
बारिश की बूंदे/
और मैं.

४. झूमता बसंत/
घने काले बादल/
नाचता मोर/
और मैं.

५. सूरज पश्चिम में/
हल्की रोशनी/
तुम्हारी यादें/
और मैं.

Wednesday, 21 March 2012

अपने गाँव की ज़मीं

अब तो लगता है की मुर्दा हो गया हूँ मैं.
शहर में आकर देख तो कैसा हो गया हूँ मैं;

देख कर गाँव की ज़मीं, पेड़ और घर की देहरी;
छलक आये आँसू, तो लगे की जिंदा हूँ मैं.

कभी पुरुआ, कभी पछुआ, आती ये हवाए;
छू जाएँ बदन को, तो लगे की जिंदा हूँ मैं.

मिट्टी से उठती हुई एक सोंधी सी महक;
दिल में बस जाए, तो लगे की जिंदा हूँ मैं.

अपने गाँव की ज़मीं में गुज़ार कर जिंदगी;
दफ़न हो 'मुसाफिर',तो लगे की जिंदा हूँ मैं.

Monday, 19 March 2012

है बस प्रेम की संभावना

निश्तेज हो फिर सूर्य भी; 
उतर आए यदि मेरे मन आकाश में.
है मेरी ये सौम्यता; 
निर्विकार सी, चंद्रमा सी ही सधी.
पृथ्वी सी सहनशीलता;
आकाश सा विस्तृत हृदय,
है देखता, सबको खुद में देखता. 

लो फिर से मैं गढ़ रहा हूँ;
प्रेम की अवधारणा,
खुद से, खुद के प्रेम की, क्या है विकट संभावना?
खुद में सबको देखना;
या सब मे खुद को देखना,
एक ही पर्याय है,है ये बस प्रेम में संभावना.
निरुत्तरित क्यों हो रहा;
ये विस्तृत आकाश भी,
मेरे मन आकाश में, है बस प्रेम की संभावना.

Monday, 12 March 2012

रात जम के बारिश तो हुई


यहाँ,रात जम के बारिश तो हुई;
पर दिल का आँगन सूखा ही रहा.

महफ़िल में लोग भी आए थे;
पर महफ़िल दिल का सूना ही रहा.

मेरी आँखे तो थीं ढूढ़ रही;
पर मेरा आईना तो झूठा ही रहा.

वो एक समंदर है मेरा;
मैं एक दरिया सा बहता ही रहा.

फूलों का ख्वाब सजाए हुए;
मैं काँटों का साथ देता ही रहा;

पल साथ मिले जी भर जी लूँ;
तिल तिल कर पल जीता ही रहा.

ज़रा वक़्त लगेगा


मेरा हौसला देखोगे तो न वक़्त लगेगा; 
पर हालत समझने में ज़रा वक़्त लगेगा.

चेहरे की रौनक तो दिख जाती है दूर से;
पर दिल को समझने में ज़रा वक़्त लगेगा. 

कहते हो न जाओगे अब मुझसे दूर तुम;
जाओगे तो पास आने में बहुत वक़्त लगेगा.

तकलीफ़ ये नहीं की दिल ये साफ़गोई है;
बस जमाने को समझने में ज़रा वक़्त लगेगा.

मैं दूर का 'मुसाफिर' चलना ही जिंदगी है;
मुश्किलों का सफ़र कटने में ज़रा वक़्त लगेगा.

जीवन सफ़र

 सबके अपने रास्ते अपने अपने सफ़र  रास्तों के काँटे अपने  अपने अपने दर्द अपनी अपनी मंज़िल अपना अपना दुख अपनी अपनी चाहते अपना अपना सुख सबकी अप...