प्रेम-वासना-बुद्ध

सच यही है,
तुम्हें पहली बार देखते ही
जो भावनायें उठीं उस में प्रेम और वासना दोनों थे
परन्तु एक आकर्षण जो तुम्हारे चेहरे पर था
वो तुम्हारे भीतर के गहरे प्रेम का आकर्षण था
तुम्हारे प्रेम की ऊष्मा में तिरोहित हो जाते है वासना के विकार
और जब मै तुम्हें देखता हूं सौम्य निश्छल चेहरे को
तुम्हारे भीतर बैठे बुद्ध को
और फिर जो घटित होता है, वो आँखो से बहती अश्रुधार
मैं समझ पाता हूँ तुम्हारे क़रीब आने के लिये
प्रकृति द्वारा रचित वासना रूपी कारक को
और उस के पीछे प्रकृति के मूल प्रेम को
जो  आदि से अनंत तक हमारा अस्तित्व है

Comments

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-02-2016) को "छद्म आधुनिकता" (चर्चा अंक-2239) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. निश्चय ही एक स्तरीय रचना , विचार और शब्द संयोजन , दोनों ही तरह से ....

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    1. प्रणाम
      आभार!!!

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  3. प्रणाम!!
    आभार!!!

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