Tuesday, 1 September 2015

वह जो मैं हूँ ही नहीं

यूं कि फिर से अंजान हो जाऊँ तुम्हे,
कि तुम मुझे जानने पहचानने लगे।

हो जाना चाहता हूँ
फिर से अपरिचित 
मिटाने को एक भ्रम 
भ्रम की तुम जानने लगे हो 
मुझे, तुम पहचानने लगे हो 
बिना उतरे हुए प्रेम में 
तुम ने परख़ लिया 
अपने तर्कों पर 
वह जो मैं हूँ ही नहीं 

1 comment:

राम

अगर कोई विकास से लेकर राष्ट्रवाद तक के इस दस मुख वाले रावण का अंत कर दे  तो मैं माँ लूँगा की राम हैं  अगर कोई अर्जुन की तरह  संश...