Tuesday, 17 July 2012

हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.
प्रेम सरस कुछ नाहीं जाग में;
यह विश्वास रहे.

तोड़ जगत के आडंबर सब;
हेरत प्रेम रहे.
हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.
----------------------------

हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.
जब खोजत, जग जाय हेराय;
तब सुख-प्रेम मिले.

खोजत रहे प्रेम जो बाहर;
भीतर आन मिले.
हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.
-----------------------------

हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.
धरती का आधार सकल शुभ;
बरसत प्रेम रहे.

जो जाने प्रेम रस मीठा;
सकल प्रेम बने.
हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.

11 comments:

  1. वाह ... बेहतरीन भाव लिए अनुपम प्रस्‍तुति।

    ReplyDelete
    Replies
    1. सहृदय आभार !!!!!!

      Delete
  2. बहुत ही मधुर एवं सरस रचना ! आभार !

    ReplyDelete
  3. सुंदर भाव समेटे कविता.

    ReplyDelete
  4. सभी को सहृदय आभार !!!
    प्रणाम स्वीकार करें.

    ReplyDelete
  5. Replies
    1. प्रणाम!!!!
      आभार !!!

      Delete

राम

अगर कोई विकास से लेकर राष्ट्रवाद तक के इस दस मुख वाले रावण का अंत कर दे  तो मैं माँ लूँगा की राम हैं  अगर कोई अर्जुन की तरह  संश...