Wednesday, 25 February 2015

रोज़ 'मुसाफिर' सा फिरते हैं

तेरी आस लगाये बैठे;
गुज़रे जाने दिन कितने है।

अब तो ये आलम है देखो;
लोग मुझे पागल कहते हैं।

तुम से नहीं तो यादों से हम;
रोज़ ही आठ पहर मिलते हैं।

दो से आठ पहर चढ़ते फिर;
ज्यों लहरें और सागर मिलते हैं।

कुछ तो सुध कर लो मेरी अब;
रोज़ 'मुसाफिर' सा फिरते हैं।

2 comments:

  1. वाह.... कमाल की गजल..... बहुत बढियां...

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