Friday, 7 June 2013

मैं अब भी समझता हूँ वो मेरा गैर नहीं.













वो मुझ से पूंछते हैं मेरा नाम, बेपरवाह;
जिन्हे मैं अब भी समझता हूँ मेरे गैर नहीं.

सुकून छीनता है जो अब भी मेरे दिल का;
वही जालिम है समझता हूँ कोई गैर नहीं.

मैं अब बताउँ जमाने को, तो बताउँ क्या;
मेरा मुंसिफ, मेरा कातिल, है मेरा गैर नहीं.

अजीब दौर से गुजर रहा हूँ जिंदगी के मैं;
कटा हुआ है, मेरा हिस्सा, है कोई गैर नहीं.
(कट के मुझ से अलग हुआ, है कोई गैर नहीं.)

दर्द मिला है 'मुसाफिर' जो जिंदगी के सफ़र में;
अब तो वो दर्द भी अपना है, है कोई गैर नहीं.

12 comments:

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    1. बहुत बहुत आभार!!!

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  2. Replies
    1. बहुत बहुत आभार!!!

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा सोमवार (10-06-2013) के चर्चा मंच पर लिंक
    की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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    1. चर्चा मंच पर लोगों से साझा करने के लिए आभार !!!

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  4. I have only one word in my mind..awesome :)

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  5. खूबशूरत अहसास

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  6. सभी पंक्तियाँ खूबसूरत हैं

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