Monday, 19 November 2012

अब तक जिन आँखों से ही देखी मैं ने दुनियां














अब तक जिन आँखों से ही देखी मैं ने दुनिया;
वो आँखे बदल गयीं या कि बदल गयी दुनिया.

साँसों की रफ़्तार में जैसे धुधला सा जीवन;
खोजता है खुद को जो गुम गयी कहीं दुनिया.

मृग तृष्णा सा लगता क्यूँ है ये सारा जीवन;
खुद से दूर सदा खोजे और खुद में ही दुनिया.

बाहर की दौड़ में सारा ख़त्म हुआ जीवन;
फिर ये समझ आया, थी भीतर असली दुनिया.

और 'मुसाफिर' प्रेम की खातिर जो भागा दौड़ा;
रुक कर जो भीतर देखा थी प्रेम सरस दुनिया.

6 comments:

  1. लाजवाब कितना मोहक शब्द-संयोजन ! वाह !

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    1. बहुत बहुत आभार संजय जी !!!

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  2. प्रेम में भीगे रहते हो निशि बाशर,बने रहो हमारे लिए .करते रहो इनायत टिप्पणियों की .

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    1. सप्रेम आभार!!!

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