पथ का राही
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Friday, 14 December 2012
चार आँखें थीं वो
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चार आँखें थीं वो लगता था तस्वीर से बाहर निकल कर सीधे भीतर झाँक रहीं हों अंतस तक दो आँखे उम्र दराज थी पर गजब की चमक थी अनुभव की शालीनत...
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Tuesday, 4 December 2012
आईना झूठ हो गया मेरा
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आग-ए-दिल से धुआँ उठता ही नहीं; दिल का जलना नज़र आता ही नहीं. आईना झूठ हो गया मेरा ; चेहरा उसका ये दिखाता ही नहीं. साफ़ दिल...
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Thursday, 29 November 2012
स्त्री, पुरुष, प्रकृति और प्रेम
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क्या यह कहना सही होगा की "प्रेम पुरुष के जीवन की एक घटना है, स्त्री के जीवन का सर्वस्व ही प्रेम है" ? प्रकृति की बाकी संरचना...
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Monday, 19 November 2012
अब तक जिन आँखों से ही देखी मैं ने दुनियां
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अब तक जिन आँखों से ही देखी मैं ने दुनिया; वो आँखे बदल गयीं या कि बदल गयी दुनिया. साँसों की रफ़्तार में जैसे धुधला सा जीवन...
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Thursday, 1 November 2012
कवितायें 'अज्ञेय' की
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कवितायें 'अज्ञेय' की समझ नहीं आता या कि मैं समझना नहीं चाहता कि बुद्धि के स्तर पर समझते हुए कहीं छूट न जाये उनका मर्म क्य...
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Wednesday, 24 October 2012
समझने को कहाँ कुछ भी रहा अब
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समझने को कहाँ कुछ भी रहा अब; कब वो समझा अपना, मेरा रहा कब. कि खुद में जलने का भी मज़ा है; मैने उस से शिकायत ही किया कब. ग...
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Tuesday, 23 October 2012
वो कहते हैं, ग़रीबी कम हुई है
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वो कहते हैं ग़रीबी कम हुई है जानते हो कहाँ कम हुई है बस आकड़ों में कम हुई है क्यों कि उन्होंने तय कर दिय...
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