Friday, 11 October 2013

दर्द यूँ भी अदाओं से कम निकलता है.

यमुना प्रसाद दूबे 'पंकज' जी ने आग़ाज किया था उसी को अंजाम देने की कोशिश है 

ग़ज़ल का मतला,ख़ास आप की महफिल के लिये
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रूह जलती है,तब पिघलता है।
दर्द,यॅू ही नही निकलता है।














चाँद और हम काँपते है रात भर छत पर;
वो मेरा चाँद है जो बहुत कम निकलता है.

हँसते है हम भी नमी आँखों में ले कर;
दर्द यूँ भी अदाओं से कम निकलता है.

तुम मिलोगे तो करेंगे बहुत सारी बातें;
देखो किस दिन ये मुक़द्दर मेरा निकलता है.

हाँ दर्द से मेरे सभी ही हैं थोड़ा संजीदा;
कि गैर के दर्द से जान कब निकलता है.

हो गयी शाम जब जिंदगी की ढलते ढलते;
'मुसाफिर' फिर कोई घर से कहाँ निकलता है.

Friday, 13 September 2013

बहुत अदना सा रह गया है इंसान

बहुत अदना सा रह गया है इंसान
तुम्हारे अल्लाह और तुम्हारे भगवान के आगे
उसे मरना पड़ता है
कभी तुम्हारे अल्लाह के नाम पर
कभी तुम्हारे भगवान के नाम पर
और जब कोई कहता है
कि तुम मार दो अपने अल्लाह को
और तुम भी मार दो अपने भगवान को
जिसे एक इंसान ने पैदा किया था
तो तुम दोनों मिलकर मार देते हो उस इंसान को
क्यों की खुद इंसान होकर भी
तुम्हे लगता है तुम्हारा अल्लाह बड़ा है
तुम्हारा भगवान बड़ा है.

Monday, 9 September 2013

देहिये के भेद न जाने इ देहिया



गईया बछरुआ मोहे मन भाए ...
कि जाने कौने माटी से बनल ई देहिया ...
जबे हम सोची इहे मन आवे ...
जाने कौने माटी मे मिलि जाई देहिया ...
तानिको न भाए मोहे ई दुनिया ..
भागी के जाई तो जाई कहाँ देहिया ....
जाने कइसन आतमा कइसन परमातमा ..
देहिये के भेद ही न जाने इ देहिया ... 

Sunday, 18 August 2013

मोहब्बत तो फकीरी से ही जिंदा है


जाने फिर क्यूँ मुझे वो याद आया;
जाने फिर क्यू ये ख़याल आया.

जिस्म दो हैं, उसका और मेरा; 
जिसमें बसता है एक ही साया.

सुबह और शाम एक ही तो है;
बस ज़रा वक़्त का फासला पाया.

बेमियादी चाहतो का मतलब;
तो मौत के बाद ही समझ आया.

जब भी उसकी याद से लिपटा;
मैं खुद का कहाँ फिर रह पाया.

जितना दौड़ा पहुँचने को उस तक ;
खुद को उतना ही दूर मैं पाया.

मोहब्बत तो फकीरी से ही जिंदा है;
'मुसाफिर' चाहकर न ज़ी पाया.



Saturday, 17 August 2013

शब्दों के खिलाड़ी














वो एक वक़्त था
जब उनके मन में थी एक आग
आग दुनिया को बदलने कि
या कि आग प्रेम की
खुद की दुनिया बदलने की
ऐसे समय में लिखे गये शब्द
जिनका एक अलग विन्यास था
वो 'कविता' थी
वक्त के साथ आग बुझने लगी
वक़्त के साथ कवितायें खोने लगी
पर शब्दों से खेलने का हुनर तब तक आ चुका था
अब मैं उन्हे शब्दों से खेलते देखता हूँ
वो आग जिसकी बात 'दुष्यंत कुमार' करते है
वो आग ख़त्म हो चुकी है
वो अब शब्दों के खिलाड़ी है
और वो खुद को 'कवि' कहलाना पसंद करते है

Friday, 7 June 2013

मैं अब भी समझता हूँ वो मेरा गैर नहीं.













वो मुझ से पूंछते हैं मेरा नाम, बेपरवाह;
जिन्हे मैं अब भी समझता हूँ मेरे गैर नहीं.

सुकून छीनता है जो अब भी मेरे दिल का;
वही जालिम है समझता हूँ कोई गैर नहीं.

मैं अब बताउँ जमाने को, तो बताउँ क्या;
मेरा मुंसिफ, मेरा कातिल, है मेरा गैर नहीं.

अजीब दौर से गुजर रहा हूँ जिंदगी के मैं;
कटा हुआ है, मेरा हिस्सा, है कोई गैर नहीं.
(कट के मुझ से अलग हुआ, है कोई गैर नहीं.)

दर्द मिला है 'मुसाफिर' जो जिंदगी के सफ़र में;
अब तो वो दर्द भी अपना है, है कोई गैर नहीं.

Sunday, 26 May 2013

मौन सहमति नही थी, विरोध था।














मौन सहमति नही थी, विरोध था।
पर तुम मौन नही समझते,
तुम भूख और तड़प नही समझते।
नही सुना तुमने जब मौन
तब हमने लिया है सहारा बंदूको का,
ताकि तुम्हारे कान खुल सके।
तुम्हे भी महसूस हो पीड़ा अपनों को खोने की,
पर शायद तुम्हें शरीर की भूख और अपनों का दर्द ही समझ आता है।
ऐसे मे हम कहाँ जायें,
तो ऐसे में हमारी बंदूके हमारी आवाज़ है,
इनसे चली गोलियां शायद तुम्हें याद दिला सकें की हमारे लोग भी यूं ही तड़प के मरे थे,
तुम्हारी गोलियों से।
और उनका कसूर सिर्फ ये था की वो तुम्हारी तरह पढ़ें लिखें नहीं थे।
वो इंसान तो थे पर तुम जैसे धूर्त नहीं थे।
उन्हें अपनी मिट्टी से प्रेम था,
जिसका तुम सौदा करना चाहते थे।
सत्य यही है, तुम इस देश का भी सौदा कर सकते हो।

जीवन सफ़र

 सबके अपने रास्ते अपने अपने सफ़र  रास्तों के काँटे अपने  अपने अपने दर्द अपनी अपनी मंज़िल अपना अपना दुख अपनी अपनी चाहते अपना अपना सुख सबकी अप...