पथ का राही
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Monday, 16 November 2015
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बहुत कुछ पा लेने की दौड़ में बहुत कुछ छूट जाता है पीछे जैसे नदियाँ निकल जाती है दूर सागर से मिलने पीछे छोड़ जाती है सदियों का सफ़र इंस...
Tuesday, 27 October 2015
रोटियाँ
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(१) रोटियाँ चूल्हे पर पकती है सिर्फ़ रोटियाँ पकती है ऐसा तो नहीं है साथ में पक रहा होता है मन में प्रेम और कि किसे पता रोटियों मे ...
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Friday, 16 October 2015
कविता
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समाज की गहरी मानसिकता को उभारती, और गहरे से एक दूसरे से गूँथती कविता जो हृदय पर उकेर देती है सजीव भावनाओं के चित्र भर देती है उमंग से ...
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Saturday, 10 October 2015
स्तब्ध, निरुत्तर और निर्जीव!!!
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मुश्किल होता है समझ पाना या की खुद को समझा पाना जब आप किसी के साथ चल रहे हो और उस के साथ होने का एहसास हो और तभी वो बिना कुछ कहे यूँ आहिस्त...
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Thursday, 8 October 2015
तुम्हारी कविता के शब्द,दलाल के शब्द जान पड़ते है
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जब मैं तुम्हारी बाज़बजाती गंधाती सोच को सुनता हूँ तो मुझे तुम्हारी कविता के शब्द उस दलाल के शब्द जान पड़ते है जो एक स्त्री को वेश्या कह ...
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Sunday, 4 October 2015
बाँधते बाँधते ज़िंदगी में बिखर जाते है
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बाँधते बाँधते ज़िंदगी में बिखर जाते है, याद आये जो तुम अश्क़ ये ढ़ल जाते है। तुम मोहब्बत में या समंदर में डूबो, ढूँढो तो हाथ में मोती ह...
Sunday, 20 September 2015
अब यही फ़ैसला कर लिया
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अब यही फ़ैसला कर लिया; हम ने खुद से गिला कर लिया| खुद से जाने लगा दूर जब; तोड़ कर आईना रख दिया| हम से सम्हला नहीं दर्दे दिल;...
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