Saturday, 30 January 2016

प्रेम-वासना-बुद्ध

सच यही है,
तुम्हें पहली बार देखते ही
जो भावनायें उठीं उस में प्रेम और वासना दोनों थे
परन्तु एक आकर्षण जो तुम्हारे चेहरे पर था
वो तुम्हारे भीतर के गहरे प्रेम का आकर्षण था
तुम्हारे प्रेम की ऊष्मा में तिरोहित हो जाते है वासना के विकार
और जब मै तुम्हें देखता हूं सौम्य निश्छल चेहरे को
तुम्हारे भीतर बैठे बुद्ध को
और फिर जो घटित होता है, वो आँखो से बहती अश्रुधार
मैं समझ पाता हूँ तुम्हारे क़रीब आने के लिये
प्रकृति द्वारा रचित वासना रूपी कारक को
और उस के पीछे प्रकृति के मूल प्रेम को
जो  आदि से अनंत तक हमारा अस्तित्व है

Thursday, 28 January 2016

जिंदगी-ट्रेन-लड़की-चाय

ट्रेन डब्बा मुसाफिर जिंदगी
तेज धीमी रफ़्तार समय
भागते हांफाते आराम

बैठे तो रेत जैसे जिंदगी
हथेली किसी के हाथ में
फिसल जाता है, हाथ भी रेत सा

सड़क पर नज़रे बचाकर
डरी सहमी सी भागती जिंदगी
पीछे निराशा में डूबे
कुंठित लोगों की फब्तियाँ

कनों मे वो आवाज़ न पड़े
वो दिल को भेदती आवाज़
कड़वाहट और मिठास
जैसे कड़ी पत्ती चाय

जिंदगी बिना दूध कड़ी पत्ती चाय
गरम फिर भी अच्छी है
जैसे भागती रहती हो
रुकी ठंडी हुई और ख़तम

Saturday, 23 January 2016

ज़िंदा मुर्दों के देश में

वो रात
जैसे ख़त्म ही न हो रही थी 
एक नौजवान की मौत हुई थी 
और जैसे सदियों के दर्द से करांहती आत्मायें 
नींद से जाग गयीं थीं 
और की दर्द की पराकाष्ठा पर क़राह रहीं थी 
मैंने उन के शरीर पर कोड़ों के निशान देखे 
वही कोड़े जिन से तुम्हारे बाप दादे 
घोड़ों के जाबुक का काम लेते थे 
सब दर्द से करांहती  लाशें जागी थी 
कि एक नौजवान की मानसिक यातनायें 
वो अपने भीतर महसूस करने लगी थी 
महसूस कर रहीं थी गले पर कसते फंदे से घुटते हुये दम को
और उनकी आँखे और जीभ बाहर आ गये थे दम घुटने से 
पर अब वो मानसिक यातनाओं से मुक्ति पा चुकी थीं
पर देख रहा हूँ की  शहर  मुर्दा घर हुये पड़े है
लोग हैं की लाश की तरह बेसुध है 
जैसे कुछ हुआ ही नहीं 
वो शायद किसी क़रीबी के मौत पर ही जागते है 
और जैसे हम है ज़िंदा मुर्दों के देश में


Monday, 18 January 2016

भाड़ में जाये तुम्हरी ये परम्परायें

सुनो, जब तुम ब्राह्मण कहते हो मुझे
तो मै सदियों से हो रहे दमन
और अत्याचार का हिस्सेदार हो जाता हूँ
पैदा होते ही तुम ने थोप दी है
ये परम्परायें
ये संस्कृति
तो मैं कहता हूँ
भाड़ में जाये
तुम्हरी ये परम्परायें
तुम्हारी तथा कथित हज़ारों साल की संस्कृति
भाड़ में जाये तुम्हारी जाति-धर्म की व्यवस्था
और सुनों जब तुम गर्व करते हो
बुद्ध का नाम ले कर
कबीर का उदाहरण दे कर
तो तुम दुनिया के सबसे घृणित व्यक्ति लगते हो
क्यों की तुम जैसे लोगों ने यहाँ से बुद्ध को संस्कृति और धर्म के नाम पर खदेड़ा था
तुम ने हत्यायें की है
सदियों से हत्यारे हो तुम
और पूरी मानवता लज्जित हो जाती है

Saturday, 19 December 2015

प्रेम-वासना

प्रेम
निर्लज्ज कर देता है
स्त्री को
खोल देती है अपना स्तन
अपने बच्चे के लिये
चलती ट्रेन या बस में

वासना
निर्लज्ज कर देती है
पुरूष को
वो नापने लगता है
उभार गोलाई और तन्यता

प्रेम
निर्लज्ज कर देता है
एक वृद्ध पुरूष को
चूम लेता है वो
पत्नी को
सब के सामने

वासना
निर्लज्ज करती है
पुरूष को
और वो नग्न हो कर
हो जाते है वासना रत
सागर तट या पार्क बेंच पर

अन्तर है
प्रेम और वासना से उपजी
निर्लज्जता में

पर पहले
समझना होगा
प्रेम और वासना को



Monday, 16 November 2015

बहुत कुछ पा लेने की दौड़ में
बहुत कुछ छूट जाता है पीछे
जैसे नदियाँ निकल जाती है
दूर सागर से मिलने पीछे छोड़ जाती है
सदियों का सफ़र
इंसान बहुत कुछ पाने की दौड़
अपनी नीड़ से दूर अपना अस्तित्व तलाशता है
पर इस बहुत कुछ पाने और खोने के सफ़र के बीच
इंसान हर रोज़ नये स्वरूप में ख़ुद को जीता है
अस्तित्व की तलाश में छद्म अस्तित्व को बुनते गढ़ते
और तोड़ते हुए

Tuesday, 27 October 2015

रोटियाँ

(१)
रोटियाँ
चूल्‍हे पर पकती है
सिर्फ़ रोटियाँ पकती है
ऐसा तो नहीं है
साथ में पक रहा होता है
मन में प्रेम
और कि किसे पता
रोटियों मे भी पकता हो प्रेम
या की प्रेम मे पक जाती हो रोटियाँ
और उस में बस जाती हो एक ख़ुश्बू
और मिठास

(२)
रोटियाँ
चूल्‍हे पर पकती हुयी
सूखा देती है खुद का पानी
या की पानी के सूखने से
तय होता है
उनका पकना
और जिंदगी की धूप में
इंसान का पकना
तय होता है
आँखो से पानी के खो जाने से
चेहरे और होठ की बनावटी हँसी के साथ
आँखों का साथ न दे पाने से

जीवन सफ़र

 सबके अपने रास्ते अपने अपने सफ़र  रास्तों के काँटे अपने  अपने अपने दर्द अपनी अपनी मंज़िल अपना अपना दुख अपनी अपनी चाहते अपना अपना सुख सबकी अप...