Sunday, 30 April 2017

The light that is enough to move next step

In the deepest darkened life journey part
There is time and place
A moment opened like a slit
From where you can have light
The light that does not goes far too away
But is enough to move next step
And there are people
To whom you can not see
But they are there to hold your hand
To let you move and go on
And go on
And go on

................

Monday, 10 April 2017

मृत्यु तुम से बिना डरे

हाँ किसी रोज़
देखना चाहता हूँ
सुंदर संगीत

किसी रोज़ सुनना चाहता हूँ
किसी की
सुंदर चित्रकारी

किसी रोज़
जी लेना चाहता हूँ
प्रेम में लिखी कविता को

किसी रोज़ भटकना चाहता हूँ
कहानियों की
भूल भुलैया में

बतियाना चाहता हूँ
पास से गुज़रती हुई
छू जाती हवा से

महसूस कर लेना चाहता हूँ
सागर की लहरों को
मन में उठते तरंगों की तरह

और कभी ख़ुद को ख़ुद के भीतर
खींचकर पैदा कर देना चाहता हूँ
सितार का संगीत

और साँसों को एक शांत
अंधेरी रात को
एकांत में ठहरे देखना चाहता हूँ

हाँ मृत्यु, तुम से बिना डरे
जीवन जैसा ही मिलना चाहता हूँ
मैं तुम से

Saturday, 1 April 2017

ज़िंदगी कम है क्या कि मौत की कमी होगी

दुबारा इश्क़ की दुनिया हरी भरी होगी
वो मिल भी जाए तो क्या अब मुझे ख़ुशी होगी - © भाई Irshad Khan Sikandar

अंधेरों के बाद, फिर जो रोशनी के साथ
मिल भी गए तो क्या पहले जैसी ख़ुशी होगी

दुनिया दूर से ख़ूबसूरत जो बहुत है
पास जाने पर भी क्या उतनी ही हँसी होगी

ज़माना पहले अलविदा कहा था जहाँ
अगली मुलाक़ात भी क्या वहीं होगी

आँखो का अश्क़ जो मोहब्बत में ठहर जाता है
तो वक़्त को भी क्या महसूस वो नमीं होगी

तुम सफ़र में हो 'मुसाफ़िर' पूरा कर ही लो
ये ज़िंदगी कम है क्या कि मौत की कमी होगी

Friday, 24 February 2017

प्रेम की परिभाषाएँ

प्रेम की सारी परिभाषाएँ
तुम पर आ कर
पेड़ के पीले पड़ गये पत्तों सी
पतित हो जाती हैं

प्रेम के एक क़तरा अनुभव के आगे
शब्दों का सारा समुद्र
जैसे रेगिस्तान सा लगता है

जीवन की सारी विषमताओं
और कष्टों के अंधेरों के बीच
प्रेम की अकेली किरण
सब कुछ रोशन कर देती है

प्रेम सुबह के ओस सी
पलकों के कोरों पर ठहर जाती है
तो कभी मन चित्त और प्राण में
प्रार्थना बन कर तरंगित हो जाती है

सूक्ष्म अति सूक्ष्म कणों तक
प्रेम आत्मिक अनुभव रूप में
ठहर जाता है जीवंत होकर
जीवन पार की यात्राओं में

Friday, 3 February 2017

हम ने गुलाब-ए-अश्क़ भी देखे है यहाँ पर

तुम दूर सही दूर से भी बात अगर हो
लहरों का साहिल से मुलाक़ात अगर हो

मुनासिब हो तो ठहरो की है शाम अभी दूर
ज़िंदगी की सुबह है, समझदार अगर हो

मरने की ख़्वाहिश तो जीने का शग़ल है
बीमार ही बीमार हो तीमार अगर हो

हम ने गुलाब-ए-अश्क़ भी देखे है यहाँ पर
काँटों की वजूद पर जो वार अगर हो

हम छोड़ भी दे रास्ता, और नाम 'मुसाफ़िर'
यादें न हो, ये ज़िंदगी सफ़र न अगर हो

Thursday, 15 December 2016

बहुत कुछ लिख दिया जाता है दिल और दिमाग़ पर

१)
बहुत कुछ लिख दिया जाता है
दिल और दिमाग़ पर
कविता या कहानी लिखने के पहले
काग़ज़ पर सिर्फ़ बिम्ब है
मन के गहरे तल पर
जीवन्त हैं अनुभूतियाँ

२)
इंसान मरता है
सच में मरने के पहले
तनहाइयों में
परेशानियों में और जाने कब कब
और जब वो इन सब से थोड़ा
सा कुछ बचा पाता है
तो वो जीता है ख़ुद को
ख़ुद को जान पाने के लिए

३)
रोशनी और अंधेरे के बीच की लड़ाई
इंसान के भीतर ख़ुद के सच
और ख़ुद में छुपे झूठ की लड़ाई है
झूठ वो जो वो दुनियाभर सामने जीत जाता है
सच वो जो वो जिस से वो ख़ुद हार जाता है

४)
ठहरने और चलने के बीच
साँस के भीतर और बाहर जाने के बीच
या की ज़िंदगी और मौत के बीच
एक पल होता है जहाँ कुछ नहीं होता
और ये पल हर, एक पल में ज़िंदा है
और वही एक पल है, जहाँ हम ज़िंदा है

५)
परछाइयाँ न तो रोशनी दे सकती है
और न ही जला सकती है
वो बस होती है परछाइयों की तरह
दिया जल भी सकता है रोशनी के लिए
जला भी सकता है तबाही के लिए

Wednesday, 26 October 2016

ख़्वाब के पार

जब भी सोचा ज़िंदगी में ख़्वाब के पार चलूँ,
ज़िंदगी ख़्वाब है, सोचा कि इस के पार चलूँ।

कह लो जो चाहो, शायद ये आख़िरी पल हो,
कि सोचता हूँ इस कहने सुनने के पार चलूँ।

बना दी तुम ने सरहदें, और सरहदों की दीवारें,
की चलूँ तो शायद इन सरहदों के पार चलूँ ।

अजीब इश्क़ भी है ख़ुद से अजीब रश्क़ भी है,
कहाँ चलूँ मैं कि अब ख़ुद ही के पार चलूँ।

न वो रहगुज़र ही रहे और न हमसफ़र ही रहे,
मुसाफ़िर हूँ, चल रहा हूँ कि सब के पर चलूँ।
 © Gyanendra

जीवन सफ़र

 सबके अपने रास्ते अपने अपने सफ़र  रास्तों के काँटे अपने  अपने अपने दर्द अपनी अपनी मंज़िल अपना अपना दुख अपनी अपनी चाहते अपना अपना सुख सबकी अप...