Tuesday, 2 October 2012

जिंदगी क्या है और क्या नहीं


लौट कर तुमको मिलेंगे फिर वहीं;
रास्ते जाते कहाँ हैं फिर कहीं.

चलना है, बस चलना ही है जिंदगी;
हैं कहाँ, कोई यहाँ मंज़िल कहीं.

तुम किनारों पर भले महफूज़ हो;
हो समंदर के बिना कुछ भी नहीं.

चाहतों को इस कदर न चाहना;
कि जिंदगी को लगे, है ही नहीं.

'मुसाफिर' हो आज़ाद दिल से सोचना;
कि जिंदगी क्या है, और क्या नहीं.

'एक शाम ग़ज़ल के नाम'



ग़ज़ल को बेहद संजीदगी से पेश करने, और उसी संजीदगी से सुनने, समझने और महसूस करने वाले लोग, उस एक शाम को अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स एण्ड लिटरेचर के म्युसियम हॉल में इकठ्ठे हुए और आगाज़ हुआ 'एक शाम ग़ज़ल के नाम' कार्यक्रम का| सत्यानारायण 'सत्या' जी की किताब 'यह भी एक दौर है' के लोकार्पण से शुरू हुई शाम, विनोद सिन्हा जी के ग़ज़लों व 'डायलॉग' के एक और खूबसूरत शाम के वादे के साथ ख़त्म हुई| महफ़िल में इस दौर के मशहूर शायरों व कुछ नये शायरों ने अपने शेर और ग़ज़ल पेश किए| ग़ज़ल को तरन्नुम में सुनाकर अपनी बात को और गहरे से महसूस कराने वाले शायरों ने ऐसी समाँ बाँधी जो सुनने वालों की जेहन में याद बनकर रहेगी| नये शायरों के ग़ज़ल को सराहा गया और उनकी हौसला अफजाई की गयी और उन्हे आगे और अच्छा लिखने की प्रेरणा मिली| इस तरह की महफ़िल नये शायरों के लिए वैसे ही है, जैसे नये पौधों को खाद व पानी मिलना, जिस से उन्हे कुछ नया लिखने की सोच और उर्जा मिलती है|
ग़ज़ल एक सशक्त माध्यम है, और सुंदर प्रस्तुति इसके एहसास को और गहरा बना देती है| विनोद सिन्हा जी, श्री कांत सक्सेना जी, अमितेश जैन जी, अजय 'अज्ञात' जी, मनोज अबोध और आनंद द्विवेदी जी की ग़ज़लों ने जिंदगी, मोहब्बत और समाज पर की गयी बातों से महफ़िल में लोगों पर गहरा असर छोड़ा। महफ़िल में आये लोग इस शाम की याद संजोए कुछ नये लोगों से मिलने के खूबसूरत एहसास के साथ विदा हुए। मैं भी कार्यक्रम के संयोजक श्री मिथिलेश श्रीवास्तव जी (कवि तथा कला एवं थिएटर समीक्षक ) के साथ वहां से चल पड़ा ।

Tuesday, 25 September 2012

कब चाहा पंख और ख्वाब गगन

जाने कब कैसे ख्वाबों के पंख मिले;
जाने कब कैसे उड़ाने की चाह मिले.

जब-जब जीवन से इस पर तकरार हुई है;
मुझको जीवन से बदले में आह मिले.

मैं ने कब चाहा पंख और ख्वाब गगन के;
मैं ने चाहा टूटे दिल को बस एक राह मिले.

जब भी मैं ने यह सवाल किया जीवन से;
बदले में एक और दर्द और एक आह मिले.

Friday, 14 September 2012

मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ


शाम के धुंधले प्रकाश में
मेरा खुद से बातें करना
दीवारों को छू कर खुद का होना, महसूस करना
महसूस करना कि श्वासों की निरंतरता ही प्राणों की गति का प्रमाण है.
मेरा अस्तित्व तो अनुभूतियों की गहराई में उतर कर, 
शून्य के अस्तित्व को चुनौती दे रहा है.
तुम नहीं समझ सकते मैं कहाँ हूँ,
क्यों कि तब मुझे भी नहीं पता होता, मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ.

Wednesday, 15 August 2012


जीवन के क्षितिज पर
गहरे, स्याह, लाल और पीले रंग में
नयी रोशनी की तरह
दिखाई देते हो,तुम ही तो हो.

जीवन के एकांत और अंधेरी रात में
आकाश में चाँदनी लिए
जो देता है,जीवन को शीतलता.
चाँद, तुम ही तो हो

जीवन के नव-दिवस पर
आगे बढ़ने की प्रेरणा देते
अप्रतिम रोशनी बिखेरते
सूरज, तुम ही तो हो.

Thursday, 26 July 2012


सरहद पार पाकिस्तान में और इधर हिन्दुस्तान में रहने वाले कुछ लोग अब भी दिल से दुआ करते हैं, की ये सरहदें ख़त्म हो जायें...........

खोया है, लोगों ने, कुछ इधर भी उधर भी;
बिखरी कुछ जिंदगी है, इधर भी उधर भी.

है ज़रा सी दूरियाँ बस सरहदों की;
दिल तो एक जैसा है, इधर भी उधर भी.

माना चोट बरसों पुरानी थी लगी;
दिल में उठती टीश है, इधर भी उधर भी.

वक्त के पत्थरों पर जो लिख गया;
इबारतें दिल मे खुदीं हैं, इधर भी उधर भी.

बिछड़ों से मिलने की चाहते जो जिंदा हैं;
सीने में एक तड़प है, इधर भी उधर भी.

Tuesday, 17 July 2012

हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.
प्रेम सरस कुछ नाहीं जाग में;
यह विश्वास रहे.

तोड़ जगत के आडंबर सब;
हेरत प्रेम रहे.
हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.
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हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.
जब खोजत, जग जाय हेराय;
तब सुख-प्रेम मिले.

खोजत रहे प्रेम जो बाहर;
भीतर आन मिले.
हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.
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हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.
धरती का आधार सकल शुभ;
बरसत प्रेम रहे.

जो जाने प्रेम रस मीठा;
सकल प्रेम बने.
हृदय स्नेह भरे;
नयनन नीर बहे.

जीवन सफ़र

 सबके अपने रास्ते अपने अपने सफ़र  रास्तों के काँटे अपने  अपने अपने दर्द अपनी अपनी मंज़िल अपना अपना दुख अपनी अपनी चाहते अपना अपना सुख सबकी अप...