पथ का राही
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Wednesday, 26 October 2016
ख़्वाब के पार
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जब भी सोचा ज़िंदगी में ख़्वाब के पार चलूँ, ज़िंदगी ख़्वाब है, सोचा कि इस के पार चलूँ। कह लो जो चाहो, शायद ये आख़िरी पल हो, कि सोचता हूँ...
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Sunday, 14 August 2016
'I' between me and myself
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I try to know who I am As the journey started from birth So to know who I am I have to give birth again, to my self With this effort o...
Thursday, 28 July 2016
वक़्त कभी नहीं ठहरता
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पता नहीं तुम्हें अब भी पता है की नहीं की ज़िंदगी की मुश्किलें मुझे तुम्हारे और क़रीब ले जातीं है और अधखुली खिड़की से आती हवा आधीअधूरी ज़िंद...
ज़िंदगी जैसे ऊन का गोला
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ज़िंदगी जैसे ऊन का गोला एक सिरा पकड़ कर हम उलझ जाते हैं ताना बाना बुनने में और बुनते उलझते कब आख़िरी सिरा आ जाता है पता ही नहीं चलता
Tuesday, 12 July 2016
शाम है और गुफ़्तगू भी
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तुम से बेहतर कोई तलाश नहीं, और कि तुम ही मेरे पास नहीं। मीन में सागर, सागर में मीन, फिर भी दोनों की है प्यास वहीं। शाम है और गुफ़्तगू...
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Sunday, 10 July 2016
खुद को ही पाउँ
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जब भी शाम ढले और जब भी तुम याद आओ और जब भी हो बारिश तुम मुझको भिगो जाओ जब भी फूल खिले और जब भी तुम याद आओ और जब जब पवन चले तुम मु...
Tuesday, 31 May 2016
'मातृभाषा'
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सारे भाषाविद झूठे लगते है देश और भाषा की राजनीति के मोहरे गढ़ते है 'मातृभाषा' की परिभाषाये जो अलग नहीं हो सकती क्यों कि वह दे...
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