पथ का राही
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Thursday, 28 July 2016
वक़्त कभी नहीं ठहरता
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पता नहीं तुम्हें अब भी पता है की नहीं की ज़िंदगी की मुश्किलें मुझे तुम्हारे और क़रीब ले जातीं है और अधखुली खिड़की से आती हवा आधीअधूरी ज़िंद...
ज़िंदगी जैसे ऊन का गोला
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ज़िंदगी जैसे ऊन का गोला एक सिरा पकड़ कर हम उलझ जाते हैं ताना बाना बुनने में और बुनते उलझते कब आख़िरी सिरा आ जाता है पता ही नहीं चलता
Tuesday, 12 July 2016
शाम है और गुफ़्तगू भी
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तुम से बेहतर कोई तलाश नहीं, और कि तुम ही मेरे पास नहीं। मीन में सागर, सागर में मीन, फिर भी दोनों की है प्यास वहीं। शाम है और गुफ़्तगू...
1 comment:
Sunday, 10 July 2016
खुद को ही पाउँ
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जब भी शाम ढले और जब भी तुम याद आओ और जब भी हो बारिश तुम मुझको भिगो जाओ जब भी फूल खिले और जब भी तुम याद आओ और जब जब पवन चले तुम मु...
Tuesday, 31 May 2016
'मातृभाषा'
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सारे भाषाविद झूठे लगते है देश और भाषा की राजनीति के मोहरे गढ़ते है 'मातृभाषा' की परिभाषाये जो अलग नहीं हो सकती क्यों कि वह दे...
Tuesday, 24 May 2016
सभ्यतायें
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सभ्यताएँ जो नहीं रोप पाती है प्रेम के बीज समाज में और आने वाली पीढ़ी में वो मर जाती हैं सभ्यतायें जो नहीं दे पातीं हैं दिशा, समन्वय...
Monday, 23 May 2016
बुद्ध और जापान
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उन्होंने जाना, 'शालीनता' युद्ध में विजय पाने से कहीं ज़्यादे महान व्यक्तिक गुण है उन्होंने दूर देश के एक अजनबी व्यक्ति को ज...
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